यह ग़रीबी और शोषण ही है जो देश में "नक्सलवाद" को जन्म देता है, देश की अर्थव्यवस्था पूंजीपतियों के हाथ.
जावेद अली आज़ाद/ ब्यूरो प्रमुख (छ.ग.)
रायपुर( सुघर गांव)। भारत देश की आजादी से पहले आदिवासियों के साथ अंग्रेजों ने बहुत सितम ढाए हैं। अंग्रेजों की गुलामी और करतूतों की क्रूरता से क्षुब्ध होकर आदिवासी "नक्सलीयों" ने जल, जंगल, जमीन की रक्षा के लिए खुद का रुख ही पलट दिया।
तस्वीरों में दिख रही यह महिला मिलिटेंट लीडर हिडमा के दाह संस्कार से पहले उसको नमन कर रही है उसका नाम सोनी सोरी है। जिस महिला को निर्दोष होते हुए केवल इसलिए गु'प्तांगों में पत्थर और मिर्च का पावडर भर दिया था कि वो एक आदिवासी थी, और अपने जमीन और जंगल को माइनिंग के लिए विरोध कर रही थी। वो कोई हथियारबंद नक्सल नहीं थी, उसका दोष केवल यह था की उसने खनिज खनन के ख़िलाफ़ आंदोलन किया और ग़रीब आदिवासी समाज के साथ हो रहे अन्याय को रोकने का प्रयत्न किया था। किसी भी समाज में महिलाओं का शोषण उत्पीड़न अगर शासक और दबंग करे तो उस समाज परिवार का प्रत्युत्तर होता है और हिडमा जैसे लोग अर्से में पैदा होते है। जो लोग सदियों से हजारों सालों से जंगल में रहते आये है वो लोग अगर भगाए जाएंगे तो विरोध ज़रूर होगा और निजाम हर शांतिपूर्ण विरोध को दमन करेगा और दमन के बाद ज़िंदा लोग उत्तर जरूर देते है।
आज़ाद भारत का अगर सबसे बड़ा योद्धा कोई होगा तो हिडमा मडावी होगा जो बस्तर के जंगलों में हमेशा अगर जंगल और जमीन बची रही। अगर महुवे के पेड़ बचे रहे तो हिडमा महुवे की खुशबू सा हर आदिवासी और उन लोगों में हमेशा महकेगा जो निरंकुश और पूंजीवादी सत्ता के खिलाफ खड़े है, खड़े नही है तो उसके खिलाफ सोचते हैं। जो कार्य अंग्रेजों ने किया वही कार्य शासन के द्वारा भी किया जा रहा है। नक्सलियों की मांगों को लेकर लंबे अरसे से शासन मांगे पूरी करने से परहेज कर रही है। संदेह जताई जा रही है कि घने जंगलों की अवैध कटाई करवाकर अब फैक्ट्री, कारखाने व खदानों का निर्माण कराया जाएगा।
आज दंडकारण्य और बस्तर के जंगलों को बचाने की एक बड़ी आवाज ख़ामोश हो गई है, मगर कभी अफ़्रीकी देश कांगो के कम्युनिस्ट लीडर पैट्रिक लुलुंबा की हत्या पे जवाहर लाल ने कहा था कि एक लुलुंबा हज़ार लुलुंबाओं को जन्म देगा, वो बात हिडमा पे लागू होती है। कैसे बड़े-बड़े उद्योगपती जिंदल, अंबानी, अदानी, लाखों करोड़ों अरबों में खेलते है और झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा में आज भी ग़रीब आदिवासी भूख से मर रहा है, जिनकी जिंदगी से ज़्यादा उनके घरों के नीचे दबा सोना, कोयला, बॉक्साइट महंगा है, खनिज बाहर आने के बाद भी लोग ग़रीब है।

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