दाखिल-खारिज पंजी में दर्ज जाति की प्रमाणित प्रति मांगी गई, शिकायतकर्ताओं ने जाति सत्यापन समिति से जांच कराने की तैयारी की
कोरबा (सुघर गांव)। 27 अगस्त 2026,
जाति प्रमाणपत्र को लेकर कोरबा जिले में एक शिकायत ने नया मोड़ ले लिया है। अनिल रात्रे, चन्द्रप्रकाश पाटले एवं मुकुन्द केशव उपाध्याय ने ओमप्रकाश बघेल के जाति प्रमाणपत्र की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि उपलब्ध पुराने शैक्षणिक अभिलेखों में उनकी जाति “रोहिदास” दर्ज है, जबकि वर्तमान में स्वयं को सतनामी (अनुसूचित जाति) समाज का सदस्य बताए जाने को लेकर उन्होंने आपत्ति जताई है। शिकायतकर्ताओं द्वारा 18 अगस्त 2026 को कलेक्टर कोरबा एवं जिला शिक्षा अधिकारी को शिकायत प्रस्तुत की गई थी। इसके बाद जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय ने 24 अगस्त 2026 को प्राथमिक शाला पहुंदा के प्रधान पाठक को पत्र जारी कर वर्ष 1978 के दाखिल - खारिज पंजी की प्रमाणित प्रति उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। पत्र में उल्लेख है कि ओमप्रकाश पिता प्रहलाद ने वर्ष 1978 में प्राथमिक कक्षा में प्रवेश लेकर अध्ययन किया था तथा शिकायतकर्ताओं द्वारा उनकी जाति के संबंध में जांच की मांग की गई है। कार्यालय ने संबंधित अभिलेख 02 दिवस के भीतर शिकायत शाखा में प्रस्तुत करने को कहा था।
पुराने स्कूल रिकॉर्ड को बताया महत्वपूर्ण दस्तावेज
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि स्कूल के दाखिल-खारिज रजिस्टर में दर्ज जानकारी जाति संबंधी लगाए गए आरोपों की जांच के लिए महत्वपूर्ण आधार हो सकती है। उनका आग्रह है कि केवल एक अभिलेख के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय जन्म संबंधी रिकॉर्ड, राजस्व अभिलेख, पारिवारिक दस्तावेज, शपथ पत्र, पटवारी प्रतिवेदन तथा जाति प्रमाणपत्र जारी करने के दौरान प्रस्तुत अन्य दस्तावेजों की भी विधिवत जांच की जाए।
जाति सत्यापन समिति के समक्ष आवेदन की तैयारी
शिकायतकर्ताओं ने कहा है कि वे अब सक्षम जाति सत्यापन समिति के समक्ष विस्तृत आवेदन प्रस्तुत करने की तैयारी में हैं। उनका कहना है कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष एवं स्वतंत्र तरीके से होनी चाहिए, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जांच में गलत जानकारी अथवा कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर प्रमाणपत्र प्राप्त करना प्रमाणित होता है, तो संबंधित कानूनों के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।
संवैधानिक लाभ वास्तविक पात्रों तक पहुंचने की मांग
शिकायतकर्ताओं ने कहा कि अनुसूचित जाति वर्ग के लिए निर्धारित संवैधानिक एवं शासकीय लाभ वास्तविक पात्र व्यक्तियों तक ही पहुंचने चाहिए। यदि किसी मामले में गलत प्रमाणपत्र के आधार पर लाभ प्राप्त किया गया हो, तो इससे वास्तविक पात्र हितग्राहियों के अधिकार प्रभावित होते हैं। इसलिए पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर तथ्य सार्वजनिक किए जाने की मांग की गई है।
न्यायिक दृष्टांतों का भी दिया हवाला
शिकायतकर्ताओं ने जाति प्रमाणपत्रों के सत्यापन से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के कुमारी माधुरी पाटिल बनाम अतिरिक्त आयुक्त, जनजातीय विकास (1994) तथा चेयरमैन एंड मैनेजिंग डायरेक्टर, एफसीआई बनाम जगदीश बलराम बहिरा (2017) जैसे न्यायिक दृष्टांतों का उल्लेख किया है। उनका कहना है कि जाति प्रमाण पत्र की वैधता का निर्धारण सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के तहत किया जाना चाहिए।
फिलहाल पूरे मामले में संबंधित अभिलेखों एवं दस्तावेजों की जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। शिकायतकर्ताओं ने प्रशासन से मांग की है कि स्कूल रिकॉर्ड, राजस्व दस्तावेज और जाति प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया से जुड़े सभी अभिलेखों की निष्पक्ष जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
0 Comments