बचपन की मुस्कान को शब्द देती पी.पी. अंचल की कविता उतरदा के शिक्षक ने बाल मन की मासूमियत और अठखेलियों का किया सुंदर चित्रण

विष्णु कुमार यादव जिला ब्यूरो चीफ 

कोरबा (सुघर गांव)। जिले के पाली विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत उतरदा स्थित स्वामी आत्मानंद शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय के शिक्षक एवं साहित्य प्रेमी पी.पी. अंचल की रचना "झाँक-झाँककर देख रहा है" इन दिनों पाठकों के बीच विशेष सराहना प्राप्त कर रही है। कविता में बचपन की निश्छलता, मासूमियत और नटखट अठखेलियों का ऐसा जीवंत चित्रण किया गया है, जो हर किसी को अपने बचपन की सुनहरी यादों से जोड़ देता है। कवि ने नन्हे बच्चे की मुस्कान, तुतलाती बोली, चंचल स्वभाव और भोलेपन को अत्यंत सरल, सरस एवं भावनात्मक शब्दों में पिरोया है।
कविता
झाँक-झाँककर देख रहा है,
करता हुआ ठिठोली।
नन्हा प्यारा बच्चा यह देखो,
जस मनोरंजन गोली।।

मुँह सुन्दर मुस्कान लिए सुत,
सबको मोह रहा है।
कोई आने वाला है अतिथि,
बाट को जोह रहा है।
बार-बार छिपता लुकता है,
बतिया तुतली बोली।
झाँक-झाँककर देख रहा है,
करता हुआ ठिठोली।।

पग उनके बड़े नाजुक हैं,
हाथ मुलायम पोनी।
खेल-तमाशे धमा-चौकड़ी,
क्रिकेट खेले घोनी।
बात-बात में माँ जाने की,
करता बहुत किलोली।
झाँक-झाँककर देख रहा है,
करता हुआ ठिठोली।।

दौड़ लगाए इधर-उधर वह,
नहीं बैठता शान्त।
विद्यालय परिसर है इनका,
इनके ही हैं प्रांत।
कभी हँसी कभी रुआँसू,
खेले आँख-मिचौली।
झाँक-झाँककर देख रहा है,
करता हुआ ठिठोली।।

कभी क्रोध आसमान पे,
कभी भोला-भाला।
कभी हँसे कभी गुदगुदी,
कभी मुँह में ताला।
खेला करते हम सभी से,
जैसे सब हमजोली।
झाँक-झाँककर देख रहा है,
करता हुआ ठिठोली।।

यह कविता बाल मन की सहज भावनाओं का सुंदर प्रतिबिंब है। रचनाकार पी.पी. अंचल ने अपनी संवेदनशील लेखनी से बच्चों की उस दुनिया को शब्द दिए हैं, जहाँ हर पल उत्साह, जिज्ञासा, प्रेम और निष्कपट आनंद से भरा होता है। उनकी यह रचना न केवल बच्चों की चंचलता का चित्रण करती है, बल्कि पाठकों के हृदय में बचपन की मधुर स्मृतियों को भी जीवंत कर देती है।
 रचनाकार  पी.पी. अंचल
शिक्षक, स्वामी आत्मानंद शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय उतरदा (जिला कोरबा)

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