मुंगेली (सेतगंगा) - छत्तीसगढ़ में 'सुशासन' और 'जवाबदेह प्रशासन' के बड़े-बड़े विज्ञापनों के पीछे जमीनी हकीकत कितनी खोखली और असंवेदनशील है, इसका एक सनसनीखेज और शर्मनाक प्रमाण मुंगेली जिले के सेतगंगा क्षेत्र से सामने आया है। यहाँ एक बेबस किसान पिछले 3 वर्षों से अपनी ही पुश्तैनी जमीन का मालिकाना हक (कब्जा) पाने के लिए तहसील कार्यालय और राजस्व अधिकारियों की चौखट पर अपनी चप्पलें घिस चुका है। लेकिन, बेलगाम हो चुके राजस्व अमले की सोची-समझी टालमटोल और बहानेबाजी के आगे देश की न्याय व्यवस्था भी लाचार नजर आ रही है।
क्या है पूरा मामला? (कागजों पर मुस्तैदी, धरातल पर शून्य) :-
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, ग्राम छुईहा निवासी पीड़ित किसान रामकुमार पिता खेलावन, और उसकी मां से जुड़ी है जिनका नाम फूलबाई पति खेलावन है जिनके पक्ष में न्यायालय नायब तहसीलदार मुंगेली-2 (क्षेत्र-सेतगंगा) द्वारा बाकायदा एक कड़ा आदेश (क्रमांक 381/ना.तह./वा./2026, 383/ना.तह./वा./2026) जारी किया गया था। इस आदेश में स्पष्ट तौर पर राजस्व निरीक्षक (RI) संजय श्रीवास्तव संबंधित पटवारी और माल जमादार को निर्देशित किया गया था कि वे थाना प्रभारी फास्टरपुर से पर्याप्त पुलिस बल और महिला बल लेकर मौके पर जाएं और पीड़ित किसान को उसकी जमीन का वास्तविक कब्जा दिलाएं। कोर्ट ने इस कार्रवाई की रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर पेश करने का कड़ा अल्टीमेटम भी दिया था।
ऐन वक्त पर बुना गया 'रायपुर' का चक्रव्यूह:-
विधिक प्रक्रिया के तहत इस कार्रवाई के लिए बकायदा नोटिस तामील (सर्व) किया जा चुका था। तय तारीख के मुताबिक आज पुलिस प्रशासन और पीड़ित किसान जमीन पर कब्जा लेने की आस में बैठे थे। लेकिन ठीक मौके पर, सिस्टम के भ्रष्ट ढर्रे का प्रदर्शन करते हुए राजस्व निरीक्षक (RI) संजय श्रीवास्तव ने एक नया और अचूक पैंतरा चल दिया। जब पीड़ित किसान ने उत्सुकता और उम्मीद के साथ आरआई से संपर्क किया, तो साहब ने बेहद गैर-जिम्मेदाराना और अकड़ भरे लहजे में कहा मुझे कलेक्टर ऑफिस से अचानक कागज मिला है कि शासकीय कार्य के लिए रायपुर जाना है। अगर मैं रायपुर से जल्दी लौट पाया तो आऊंगा, नहीं तो नहीं आ सकता। अपनी व्यवस्था देख लो।
3 साल से मानसिक और आर्थिक प्रताड़ना का शिकार अन्नदाता :-
यह कोई पहली बार नहीं है जब इस लाचार किसान के साथ ऐसा भद्दा मजाक किया गया हो। पीड़ित किसान पिछले 3 वर्षों से लगातार इसी तरह की बहानेबाजी का शिकार हो रहा है। हर बार कब्जा दिलाने की एक नई तारीख तय की जाती है, कागजी घोड़े दौड़ाए जाते हैं, और ऐन वक्त पर राजस्व अमला कोई न कोई नया बहाना बनाकर गायब हो जाता है। इस अंतहीन टालमटोल ने किसान को पूरी तरह तोड़कर रख दिया है, आर्थिक तबाही, तीन सालों से लगातार तहसील, कचहरी और अधिकारियों के चक्कर काटने, वकीलों की फीस देने और कागजी कार्रवाई में किसान की जमा-पूंजी खत्म हो चुकी है और वह कर्ज के दलदल में धंस गया है। मानसिक उत्पीड़न, अपनी ही जमीन होते हुए भी उस पर खेती न कर पाना और अधिकारियों के दफ्तरों में हर दिन अपमानित होना किसान को डिप्रेशन की कगार पर ले आया है।
गंभीर सवाल: क्या कोर्ट के आदेश से बड़े हैं आरआई साहब?
इस पूरे घटनाक्रम ने मुंगेली जिला प्रशासन और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है।
1. अगर पुलिस बल की तैनाती हो चुकी थी और कोर्ट का सख्त आदेश था, तो ऐन वक्त पर आरआई को रायपुर भेजने की इतनी आपातकालीन जरूरत क्यों पड़ी?
2. क्या यह दौरा जानबूझकर कार्रवाई को टालने और विपक्षी भू-माफियाओं या रसूखदारों को फायदा पहुंचाने के लिए प्लान किया गया था?
3. एक तरफ जहां सरकार किसानों को प्राथमिकता देने की बात करती है, वहीं मुंगेली का राजस्व अमला एक साधारण किसान को 3 साल तक प्रताड़ित कैसे कर सकता है?
यह मामला सीधे तौर पर माननीय न्यायालय की अवमानना और प्रशासनिक तानाशाही का है। यदि जिला कलेक्टर और उच्च अधिकारी इस मामले में तत्काल संज्ञान लेकर दोषी आरआई और संलिप्त अधिकारियों पर कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए पीड़ित किसान को कब्जा दिलाना बहुत ही जरूरी है ताकि आम जनता का कानून और प्रशासनिक व्यवस्था से भरोसा बना रहे कि ऐसा ना हो की आम जानते को कानून और प्रशासनिक व्यवस्था पर विश्वास उठ जाए ।

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