रोजगार नहीं तो आंदोलन” मनमोहन राठौर की हुंकार,कोरबा में SECL परियोजनाओं पर उठे बड़े सवाल

रोजगार नहीं तो आंदोलन” मनमोहन राठौर की हुंकार,कोरबा में SECL परियोजनाओं पर उठे बड़े सवाल
 स्थानीय बेरोजगारों की अनदेखी का आरोप,60 किमी ‘रोजगार दो न्याय यात्रा’ और कलेक्टर कार्यालय घेराव का ऐलान 
  विष्णु कुमार यादव जिला ब्यूरो
कोरबा (सुघर गांव)। 01 अप्रैल 2026,छत्तीसगढ़ के औद्योगिक हृदय कहे जाने वाले कोरबा जिले में रोजगार  का मुद्दा एक बार फिर सियासी तापमान बढ़ा रहा है। भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (NSUI) के जिलाध्यक्ष (ग्रामीण) मनमोहन राठौर ने जिला प्रशासन और SECL प्रबंधन के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए “रोजगार दो न्याय यात्रा” आंदोलन की घोषणा कर दी है। राठौर ने कलेक्टर को भेजे पत्र में स्पष्ट किया है कि जिले के दीपका,गेवरा,कुसमुण्डा,पाली  और कोरबा क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कोयला उत्पादन हो रहा है, लेकिन स्थानीय भू-विस्थापितों और प्रभावित ग्रामीणों एवं जिले वाशी को रोजगार देने में लगातार अनदेखी की जा रही है।उन्होंने आरोप लगाया कि ठेका कंपनियां बाहरी राज्यों के एवं अन्य शहरों के लोगों को प्राथमिकता दे रही हैं, जबकि नीति के अनुसार पहले अधिकार स्थानीय प्रभावितों का होना चाहिए।
  मुख्य बिंदु- स्थानीय युवाओं के साथ “अन्याय” का आरोप
NSUI का कहना है कि खदानों और परियोजनाओं से सबसे ज्यादा प्रभावित होने के बावजूद स्थानीय युवाओं को रोजगार से वंचित रखा जा रहा है। इससे क्षेत्र में आक्रोश बढ़ रहा है।
     प्रशासन पर “उदासीनता” के गंभीर आरोप
16 मार्च को दिए गए आवेदन के बावजूद 7 दिन के भीतर कोई ठोस कार्रवाई नहीं होने पर प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए गए हैं। संगठन ने इसे “टालमटोल और निष्क्रियता” करार दिया है।
       60 किमी की पदयात्रा का ऐलान
10 अप्रैल तक समाधान नहीं होने पर ग्राम पंचायत बोईदा (पाली) से 60 किमी लंबी “रोजगार दो न्याय यात्रा” निकाली जाएगी, जो दो दिन में पूरी होकर तीसरे दिन से अनिश्चित कालीन कलेक्टर कार्यालय का घेराव करेगी।
  आंदोलन को राजनीतिक समर्थन मिलने के संकेत
इस मुद्दे की जानकारी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज,नेता प्रतिपक्ष डॉ.चरणदास महंत,सांसद ज्योत्सना महंत और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल समेत,पूर्व राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल, जिला कांग्रेस कमेटी और कई बड़े नेताओं को भी भेजी गई है, जिससे आंदोलन के व्यापक राजनीतिक रूप लेने के संकेत मिल रहे हैं।
      राजनीतिक मायने और आगे की राह
कोरबा,जहां देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली खदानें संचालित हैं,वहां रोजगार को लेकर उठती आवाजें अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रह गई हैं। NSUI का यह आंदोलन यदि व्यापक जनसमर्थन जुटाता है, तो यह राज्य की सियासत में बड़ा मुद्दा बन सकता है। अब निगाहें जिला प्रशासन और SECL प्रबंधन पर टिकी हैं कि वे इस बढ़ते असंतोष को कैसे संभालते हैं।संवाद से या फिर आंदोलन की आंच को और तेज होने देते हैं।

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