पत्रकार के साथ बदसलूकी और जातिसूचक गालियां, FIR के बाद भी आरोपियों की गिरफ्तारी न होने से आक्रोश,लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार, अंबिकापुर में पत्रकार से मारपीट !


सरगुजा ( सुघर गांव )। छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से एक विचलित करने वाली खबर सामने आ रही है। शहर के व्यस्त गुदड़ी चौक पर कवरेज करने गए एक स्थानीय पत्रकार के साथ सरेआम मारपीट की गई है। हैरानी की बात यह है कि पुलिस ने मामला तो दर्ज कर लिया है, लेकिन आरोपी अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं। आखिर क्यों थमी है पुलिस की कार्रवाई? क्या राजनीतिक दबाव प्रेस की स्वतंत्रता पर भारी पड़ रहा है? यह नजारा है अंबिकापुर के व्यस्ततम गुदड़ी चौक का, जहां नारेबाजी और प्रदर्शन के बीच लोकतंत्र के चौथे स्तंभ यानी पत्रकारिता को लहूलुहान करने की कोशिश की गई। जानकारी के मुताबिक, इलाके में राजनीतिक कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन चल रहा था। माहौल तनावपूर्ण था। तभी एक स्थानीय पत्रकार अपना कर्तव्य निभाने वहां पहुंचा और स्थिति की वीडियो रिकॉर्डिंग शुरू की। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि जैसे ही कैमरा ऑन हुआ, प्रदर्शन कर रहे कार्यकर्ता भड़क गए। पत्रकार को डराया-धमकाया गया और रिकॉर्डिंग बंद करने का दबाव बनाया गया। जब पत्रकार नहीं झुका, तो उसके साथ कथित तौर पर मारपीट की गई। घटना के बाद कोतवाली थाना अंबिकापुर में एफ आई आर दर्ज किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि नामजद एफआईआर के बावजूद अब तक एक भी गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई? क्या सत्ता का रसूख कानून के हाथों को बांध रहा है? इस घटना ने न केवल प्रशासनिक कार्यप्रणाली बल्कि प्रेस की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। "अंबिकापुर की यह घटना बता रही है कि जमीनी स्तर पर पत्रकारों के लिए स्थितियां कितनी चुनौतीपूर्ण होती जा रही हैं। अगर वीडियो बनाना अपराध है, तो फिर सूचना की पारदर्शिता कहां रहेगी? स्थानीय पत्रकार संगठनों में इस घटना को लेकर भारी आक्रोश है और उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई, तो आंदोलन उग्र होगा।" इस हमले ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जब सच का सामना होता है, तो लाठियां और धमकियां ही हथियार बनती हैं। हम प्रशासन से सवाल पूछते हैं कि आखिर कब तक पत्रकार ऐसे हमलों का शिकार होते रहेंगे? छत्तीसगढ़ के सरगुजा क्षेत्र में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर हमले का एक गंभीर मामला सामने आया है।एक पत्रकार के साथ सार्वजनिक स्थान पर न केवल धक्का-मुक्की और मारपीट की गई, बल्कि जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर जान से मारने की धमकी भी दी गई। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) और SC/ST एक्ट की गंभीर धाराओं में मामला तो दर्ज कर लिया है, लेकिन आरोपियों की अब तक गिरफ्तारी न होने से कानून व्यवस्था और पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं,इस खबर पर हमारी नजर बनी रहेगी।
क्या है पूरा मामला

मिली जानकारी के अनुसार, पत्रकार जब अपने पेशेवर दायित्व का निर्वहन करते हुए एक सार्वजनिक घटना की रिकॉर्डिंग कर रहे थे, तभी कुछ रसूखदार लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। पत्रकार द्वारा इसे अपना कर्तव्य बताए जाने पर आरोपी भड़क गए और उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। आरोप है कि इस दौरान पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में ही पत्रकार को जातिगत गालियां दी गईं और जान से मारने की धमकी दी गई।पुलिस और ' राजनीतिक संरक्षण' पर सवाल इस मामले में पुलिस ने तीन नामजद आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज की है। हालांकि, घटना के दौरान कथित तौर पर एक पुलिस अधिकारी के सामने दिए गए बयानों ने चर्चाओं को गर्म कर दिया है। जानकारों का मानना है कि आरोपियों को मिल रहा ' राजनीतिक संरक्षण ' ही पुलिस की कार्रवाई में देरी का मुख्य कारण है। विशेषज्ञों का कहना है कि पुलिस की जवाबदेही संविधान के प्रति होनी चाहिए, न कि किसी जनप्रतिनिधि के प्रति।

मुख्य बिंदु धाराएं

पुलिस ने BNS, 2023 और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया है।
मीडिया पर हमला 

सार्वजनिक रिपोर्टिंग के दौरान हुई यह हिंसा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा आघात मानी जा रही है।

बढ़ता आक्रोश 

 गिरफ्तारी न होने से पत्रकार और सामाजिक संगठनों में भारी रोष है। बड़े आंदोलन की चेतावनी पत्रकार संगठनों ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए प्रशासन को अल्टीमेटम दिया है। प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि जल्द ही आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं हुई, तो प्रदेश स्तर पर चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा। इसके तहत धरना-प्रदर्शन और ज्ञापन सौंपने जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।

निष्कर्ष 

सरगुजा की यह घटना एक बड़ा सवाल खड़ा करती है कि क्या आज के दौर में पत्रकार सुरक्षित हैं? यदि सार्वजनिक स्थानों पर पुलिस के सामने भी रसूखदार लोग कानून को हाथ में ले रहे हैं, तो आम नागरिक की सुरक्षा की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस मामले में निष्पक्ष कार्रवाई करता है या सत्ता का प्रभाव कानून पर भारी पड़ता है।

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