विष्णु कुमार यादव जिला ब्यूरो
कोरबा (सुघर गांव)। 28 दिसंबर 2825, जिले में एसईसीएल की गेवरा परियोजना से विस्थापित हजारों परिवारों का धैर्य अब टूट चुका है। पोड़ी, बाहनपाठ और आमगांव के ग्रामीणों के साथ हालिया बैठक शांतिपूर्ण भले दिखी हो, लेकिन यह शांति सिर्फ तूफान से पहले की खामोशी है। मुआवजा, रोजगार और पुनर्वास की अनदेखी ने विस्थापितों को निर्णायक संघर्ष की राह पर धकेल दिया है।
बैठक हुई, लेकिन भरोसा नहीं जागा
कंपनी ने कई बिंदुओं पर चर्चा और कमेटी में भेजने का आश्वासन दिया, लेकिन विस्थापितों का साफ संदेश है: "हम कागज़ों पर भरोसा नहीं करते, हमें जमीन पर हक चाहिए।"
बैठक के मुख्य मुद्दे
वैकल्पिक रोजगार के प्रस्ताव पर चर्चा,पुराने मुआवजे के आवेदन कमेटी को भेजने का भरोसा, बसाहट राशि बढ़ाने के मामलों पर पुनर्विचार,मृतक महिला,विवाहित बेटियों और संवेदनशील मामलों को शामिल करने की सहमति ठेका कार्यों में विस्थापितों की भागीदारी, लेकिन किसी भी मांग की समय-सीमा न बताने से नाराजगी और बढ़ गई।
विस्थापितों का आरोप सिर्फ मीटिंग,कोई समाधान नहीं
ग्रामीणों का कहना है कि गेवरा परियोजना वर्षों से चल रही है, लेकिन न पूरा मुआवजा मिला, न स्थायी रोजगार, न सम्मानजनक पुनर्वास और इस बीच खदान से कोयला निकलता रहा, लेकिन लोग संघर्ष में पिसते रहे।
आंदोलन अब उग्र रूप ले चुका है
अब चेतावनी का दौर खत्म हो चुका है, विरोध सीधे टकराव की शक्ल ले चुका है। नराईबोध गांव के विस्थापितों ने 12 दिसंबर से अनिश्चितकालीन गेट जाम और खदान बंद करने की चेतावनी दी, 16 दिसंबर को छत्तीसगढ़ किसान सभा और भू विस्थापित रोज़गार एकता संघ के नेतृत्व में महा घेराव
मुख्य मांगें
स्थायी रोजगार की गारंटी, ₹10–15 लाख तक बसाहट राशि का तत्काल भुगतान, अधूरे मुआवजे का तुरंत निपटान।
महिलाओं की उपेक्षा ने आग भड़का दी
विस्थापन की मार सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ी। 5 दिसंबर को जिला महिला कांग्रेस कमेटी ने गेवरा कार्यालय घेराव विधवाएं, परित्यक्त महिलाएं और विवाहित बेटियां बसाहट राशि से बाहर, अक्टूबर 2025 में शांतिपूर्ण आंदोलन पर सीआईएसएफ लाठीचार्ज, कई विस्थापित घायल।
अब पीछे हटने का सवाल ही नहीं
"हमने घर खोया, जमीन खोई, रोजगार खोया—अब चुप नहीं बैठेंगे।" पोड़ी, बाहनपाठ और आमगांव की बैठक को विस्थापित अंतिम चेतावनी मान रहे हैं। आने वाले दिन गेवरा में बड़े और निर्णायक आंदोलन के गवाह होंगे।
सवाल सीधे हैं शांति या संघर्ष
अब पूरा गेवरा पूछ रहा है— क्या एसईसीएल विस्थापितों को उनका हक देगा, या खदानें फिर से जनआंदोलन से थम जाएंगी? जवाब अब फाइलों में नहीं, सड़कों पर लिखा जाएगा।
0 Comments