श्रद्धा के फूल ...माँ के चरणों में अर्पण

श्रद्धा के फूल ...माँ के चरणों में अर्पण 
कोसीर (सुघर गांव)। 28 जुलाई 2025,
अभी तो सुबह हुई थी नींद से जगा था 
बिस्तर में सोए सोए तुम्हें निहार ही रहा था
न जाने मेरी आँखें फिर लग गई
तुम्हें देखने झट से उठा ही था
तू मेरे पलक झपकते ही रूठ गई
तुम्हें अंतिम बार माँ शब्द भी न कह सका 
कितना दर्द हुआ उस पल 
 ऐसे भी कोई माँ रूठती है क्या 
हे जननी मैं ऋणी ही रह गया 
अब मुझे कौन रोकेगा टोकेगा 
बेटा कहके याद कौन करेगा 
तु रूठ गई सच में मैं टूट गया 
तुने सपने बुने थे आंचल में छुपा कर 
न जाने वक्त ने धोखा दे दिया 
अनमने मन से तु चली गई 
मेरा हृदय यह बात स्वीकार नहीं कर पा रहा 
कुछ दिन और तेरे आंचल का प्यार बरसता 
कह पाता माँ...
कौन यज्ञेय वैभव भावेश से अब तु मै करेगा 
 वे तो समझ ही नहीं पाए 
दादी - दादी कहके किसे बुलाए 
 घर का आँगन सुना हो गया 
तुम जो रूठ गई 
सपने सारे टूट गई 
अंतिम बार माँ भी न कह सका 
मेरा अंतिम प्रणाम भी अधूरा रह गया 
संघर्ष के ये पल बस अब यादों में रहेंगे 
 तुम जब याद आओगी 
आँखें नम हो जायेगी 
बहते आंसुओं को छुपा लूंगा 
 तुम्हें याद करके मन को समझा लूंगा 
मेरी श्रद्धा के शब्द तुम्हें हमेशा प्रणाम करेंगे 
तेरे चरणों में जो श्रद्धा के फूल चढ़ाए मैने 
वह फूल धन्य हो गए ...
   हे! माँ विनम्र श्रद्धांजलि ...
      (माँ को समर्पित एक रचना)
लक्ष्मी नारायण लहरे ' साहिल,
साहित्यकार पत्रकार सारंगढ़

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