कोल ब्लॉक आवंटियों और छत्तीसगढ़ सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने किया सवाल,आखिर पेड़ कहां लगाए जा रहे हैं?'

कोल ब्लॉक आवंटियों और छत्तीसगढ़ सरकार से सुप्रीम कोर्ट ने किया सवाल,आखिर पेड़ कहां लगाए जा रहे हैं?'

हसदेव अरण्य जंगल के पेड़ों की हो रही अंधाधुंध कटाई, आखिर पेड़ कहां लगाए जा रहे हैं?

         ब्यूरो प्रमुख छत्तीसगढ़
बिलासपुर (सुघर गांव)। 25 जुलाई 2025, 
हसदेव अरण्य, परसा कोल वन क्षेत्र में कोयला खनन को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने कोल ब्लॉक आवंटियों और राज्य सरकार से पूछा कि क्षतिपूर्ति उपायों के तहत पेड़ कहां लगाए जा रहे हैं? जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी,पहली याचिका सुदीप श्रीवास्तव, छत्तीसगढ़ स्थित अधिवक्ता और कार्यकर्ता द्वारा दायर की गई, जिसमें केंद्र सरकार को परसा ईस्ट और केंते बासन और परसा कोल ब्लॉक, छत्तीसगढ़ के लिए दी गई सभी गैर वनीय उपयोग और खनन अनुमतियों को रद्द करने का निर्देश देने की मांग की गई थी। दूसरी याचिका दिनेश कुमार सोनी द्वारा दायर की गई, जिसमें समान मुद्दे उठाए गए और यह कोलगेट मामले से संबंधित है, जिसमें चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने 1993,2009 के बीच कोयला आवंटन को अवैध घोषित किया था।
याचिकाकर्ता दिनेश कुमार सोनी की ओर से एडवोकेट प्रशांत भूषण ने दोहराया कि यह मामला हसदेव अरण्य वन में वनों की कटाई से संबंधित है, जिसे पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा एक अछूता और निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया गया। उन्होंने दलील दी, इस मामले में दिए गए सभी खनन पट्टे अछूते और निषिद्ध क्षेत्र में हैं, जबकि कोयला खनिज भंडार का केवल दस प्रतिशत ही अछूता और निषिद्ध क्षेत्र में है। फिर भी उन्होंने खनन की अनुमति दे दी है। परिणाम स्वरूप आज पेड़ों की बेतहाशा कटाई हो रही है। इसी प्रकार कोलगेट मामले के आधार को इस बात पर प्रकाश डाला कि जब वही कोयला ब्लॉक उसी एजेंसी को दिए गए तो सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए आवंटन रद्द कर दिया कि उन्हें वस्तुतः एक निजी संस्था अन्यथा अडानी समूह को पट्टे पर दे दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए जाने के बाद वही चीज़ फिर से आवंटित कर दी गई। फिर से अडानी को पट्टे पर दे दी गई है। उन्होंने तर्क दिया कि यह आवंटन कोलगेट मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन है। भूषण के इस तर्क का कि खनन पट्टा 'नो-गो' क्षेत्र के लिए दिया जा रहा है। सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी (प्रतिवादियों की ओर से) ने विरोध किया। खंडपीठ ने काटे गए/काटे जाने की संभावना वाले पेड़ों की अनुमानित संख्या के बारे में पूछा तो रोहतगी ने जवाब दिया कि चरणबद्ध तरीके से पेड़ काटने की अनुमति है, अगर आपको 100 पेड़ काटने की अनुमति मिलती है तो आपको 1000 पेड़ लगाने होंगे, क्योंकि कोयले की आवश्यकता होती है, इस अनुमति से संतुलन बना रहता है। हमारे पास सभी आवश्यक अनुमतियां हैं।
जवाब में जस्टिस कांत ने सवाल किया, लेकिन यह कौन करता है कि अगर 100 पेड़ काटे जाते हैं तो 1000 पेड़ लगाए जाते हैं? वे 1000 पेड़ कहां हैं? वे किस क्षेत्र में लगाए गए? किसने लगाए हैं? क्या कोई सरकारी एजेंसी वृक्षारोपण या निगरानी में शामिल है? इस पर रोहतगी ने कहा कि वृक्षारोपण प्रतिवादियों द्वारा किया जाना है, जबकि निगरानी सरकार द्वारा की जानी है। उन्होंने कहा, छत्तीसगढ़ का वन विभाग यह देखने के लिए बाध्य है।उनकी बात सुनते हुए जस्टिस कांत ने टिप्पणी की कि यह कहना बहुत आसान है, कि 100 पेड़ों की भरपाई के लिए 1000 पेड़ लगाए जाएंगे, लेकिन सवाल यह है कि ये पेड़ किस क्षेत्र में लगाए जाएंगे। छत्तीसगढ़ के उसी ज़िले में जहां पेड़ काटे जा रहे हैं, या किसी अन्य राज्य में। याचिकाकर्ता सुदीप श्रीवास्तव व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए और उन्होंने तर्क दिया कि प्रतिवादी भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट का उल्लंघन करते हुए दूसरा और तीसरा कोयला ब्लॉक खोल रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने न्यायालय को सूचित किया कि देश के कुल कोयला भंडारों में से केवल 10% ही घने जंगलों में स्थित हैं। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए श्रीवास्तव ने कहा कि घने जंगलों में स्थित कोयला भंडारों को छुए बिना कोयले की सभी माँग वर्तमान और भविष्य की पूरी की जा सकती है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह भी तर्क दिया गया कि किसी भी शमन प्रयास, जैसे कि वनरोपण के बावजूद, खनन कार्यों से हसदेव वन क्षेत्र को अपूरणीय क्षति होगी। श्रीवास्तव ने यह भी दावा किया कि कोयला ब्लॉक में 3.68 लाख पेड़ हैं और दूसरे ब्लॉक में 96,000। उन्होंने आगे कहा कि रिपोर्टों के अनुसार, दोनों ब्लॉकों में कुल संख्या 10 लाख से ज़्यादा है। यह भी तर्क दिया गया कि प्रतिवादियों की ज़रूरतें पहले ब्लॉक से पूरी हो सकती हैं, फिर भी वे दूसरे और तीसरे ब्लॉक जहाँ 98% घना जंगल है, में घुस रहे हैं। भूषण ने इस संबंध में ज़ोर देकर कहा, उन्हें घने जंगल में जाने की क्या ज़रूरत है? यही मुद्दा है। रिपोर्ट पर ज़ोर देते हुए वकील ने आगे कहा कि भारतीय वन्यजीव संस्थान ने एक तीखी रिपोर्ट दी है, जिसमें कहा गया कि इस क्षेत्र में खनन की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। न्यायालय के एक प्रश्न के उत्तर में श्रीवास्तव ने कहा कि विचाराधीन क्षेत्र मानव-हाथी संघर्ष का केंद्र है। भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि भारत में मानव,हाथी संघर्ष के कारण होने वाली मौतों में से 15% छत्तीसगढ़ में होती हैं। सीनियर एडवोकेट डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने पारसाकेंटे कोलियरीज लिमिटेड की ओर से पेश होकर दलील दी कि इस संस्था को एक शुल्क लेकर कार्य करने के लिए खदान विकासकर्ता और संचालक के रूप में चुना गया था और इस सब में उसकी कोई भूमिका नहीं है। 
खंडपीठ ने जब पूछा कि क्या इस मामले में छत्तीसगढ़ राज्य की कोई भूमिका है तो भूषण ने बताया कि पूरी राज्य विधानसभा ने कोयला खनन के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया। दूसरी ओर, एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि राज्य वनरोपण के लिए कदम उठा रहा है। जस्टिस कांत ने उनसे पूछा, क्या आपके पास वन क्षेत्र का हवाई दृश्य है? पहले चरण में क्या काटा गया और किस तरह से पेड़ काटे गए? यदि वैकल्पिक वृक्षारोपण है, तो वह कहां है, और वर्तमान स्थिति क्या है? अंततः, मामले को स्थगित कर दिया गया ताकि पक्षकार अपनी सुविधानुसार संकलन और जवाब दाखिल कर सकें। भूषण द्वारा यह कहते हुए तत्परता दिखाने के बाद कि मानसून समाप्त होते ही पेड़ों की कटाई फिर से शुरू हो जाएगी। खंडपीठ ने मामले को 19 अगस्त के लिए सूची बद्ध कर दिया।




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