बुद्ध जयंती पर विशेष सुघर गांव रायपुर" तथागत गौतम बुद्ध का धम्म सनातन हो कर मानवता को दुखो से मुक्ति दिलाने का हो कर प्रज्ञा,मैत्री और समानता के वैज्ञानिक तर्क के साथ सदुपयोगी है "

     बुद्ध जयंती पर विशेष सुघर गांव रायपुर
" तथागत गौतम बुद्ध का धम्म सनातन हो कर मानवता को दुखो से मुक्ति दिलाने का हो कर प्रज्ञा,मैत्री और समानता के वैज्ञानिक तर्क के साथ सदुपयोगी है " 
 रायपुर (सुघर गांव)। 12 मई 2025,
 बुद्ध धम्म के साहित्य " धम्म पद " की गाथा क्रमांक (5) में उल्लेख है की " वैर से वैर नही मिटता है बल्कि अवैर से ही वैर (दुश्मनी,अदावती) मिटता है, यही धम्म सनातन है। " बुद्ध के उपदेश उनकी देशनाए,
ज्ञान आज भी मानवता के लिए उपयोगी है, शाश्वत है, हमेशा से ही प्रभावकारी बने हुए है इसलिए बुद्ध का धम्म सनातन है।
  बुद्ध के वचन उपयोगी है जैसे " अज्ञानता से भय पैदा होता है, भय से अंधविश्वास पैदा होता है, अंधविश्वास से अंधभक्ति पैदा होती है,अंधभक्ति से व्यक्ति का विवेक शून्य हो जाता है और जिसका विवेक शून्य हो जाता है वह इंसान मानसिक गुलाम होता है। "..
इसलिए अज्ञानी नही ज्ञानी बनने पर जोर दिया गया है। अन्य वचन तथागत बुद्ध ने भिक्खुओ को संबोधित करते आनंद से कहा (पाली में कहा हिंदी अर्थ है ) " आनंद तुम लोग अपने द्वीप में आप विहार करो अर्थात अपने आप पर निर्भर हों ओ,स्वयं अपनी शरण आप बनो,न अन्य किसी दूसरे के भरोसे मत रहो, बताए धम्म(उपदेशों ,मार्ग) के द्वीप में विहार करो और धम्म की शरण में हो जाओ "। हालांकि कई विद्वान अतः दीपो भव को अपना दीपक आप बनो कहते है। लेकिन " धम्म पद " साहित्य में गाथा संख्या 25में " दीप " शब्द " द्वीप " के अर्थ में तथा गाथा संख्या 146 में " पदीप" शब्द का अर्थ प्रकाश या दीपक के अर्थ में बताया गया है। फिर भी पठक गण यही भावार्थ में रहे की व्यक्ति को अपना विकास  अपने प्रयासों से अपने पर भरोसा करके किया जाना होता है। इस बात को धम्म पद साहित्य के गाथा क्रमांक 160 से पुष्टि किया जा सकता है,जिसमे बताया गया है कि "अत्ताही अत्तनाओ नाथों,को ही नाथो परोसिया "अर्थात अत्ता याने आप,अत्तानओ याने अपने,
स्वयं के तथा नाथो याने स्वामी, मालिक है। अर्थात "तुम (मनुष्य) अपने स्वामी मालिक आप हो कोई और दूसरा नही हो सकता। और स्पष्ट रूप में तुम (मनुष्य) अपने ही दुख दूर करके (उपाय, निवारण द्वारा) सुखी होते हो और तुम ही प्रकृति के नियमो को तोड़ कर अपने दुख पैदा कर अपनी दुर्गति बनाते हो।
इसलिए बुद्ध ने अपने धम्म, देशनाओ में,उपदेशों में  पूजा - पाठ,आराधना,कर्मकांड करने की अपेक्षा मनुष्य नैतिकता पर जोर दिया,उस काल के हिसाब से, लेकिन वर्तमान काल में मनुष्य की वह नैतिकता देश के संविधान से संरक्षित करवाया गया है। ऐसे में अन्य धार्मिकता में जो स्थान अदृश्य शक्ति का बताया है वैसा ही स्थान बुद्ध धम्म में मनुष्य,उसका कल्याण और नैतिकता का है।
        "बुद्ध धम्म का इतिहास "
    तथागत गौतम बुद्ध का जन्म शाक्य गणराज्य कपिलवस्तु के निकट लुंबिनी (वर्तमान में नेपाल क्षेत्र) में हुआ (अवधि 563 ईसा पूर्व से 483 ईसा पूर्व)। उनके पिता शुद्धोधन थे माता महामाया थी। चीनी यात्रियों के वृत्तांत से, सम्राट अशोक स्तंभ लेख से, सांची स्तूप से,भरहुत से प्राप्त प्रमाणों से बताया गया है कि गौतम बुद्ध से पहले भी लगभग 27 (सत्ताइस) बुद्ध और है।  सिंधु घाटी सभ्यता से मिले प्रमाण बुद्ध काल में मिले प्रमाण से मिलते जुलते है इसे भाषविद प्रोफेसर राजेंद्र प्रसाद सिंह ने तथा अन्य विद्वानों ने बताया है। उस काल में समन/शमन (पाली में) सभ्यता समाज में रही है जो प्रकृति को और अपने कर्म को मानते रहे थे लेकिन बाद में समन शब्द को संस्कृत में " श्रमण " किया गया। शमन सभ्यता में संभवतः आम लोगो में बोली और भाषा प्राकृत होकर "पाली " रही है। गौतम बुद्ध से पहले भी बुद्ध रहेहै याने समाज को उपदेश दिए जाते रहे होंगे। साहित्य धम्मपद में "बुद्ध " किसी व्यक्ति का विशेष नाम नही है बल्कि बोधी याने ज्ञान प्राप्त व्यक्ति जिसने सत्य ज्ञान (सभी बातो का) प्राप्ति से पूर्ण हो कर विशेष गुण और विशेष अवस्था को प्राप्त कर लिया वह " बुद्ध" हो सकता है। इसी तरह पाली में " बमन" शब्द है जो विद्वान, समझदार,ज्ञानी व्यक्ति को   संबोधित था,जो गुण वाचक शब्द रहा है जिसे बाद में संस्कृत में एक वर्ण "ब्राह्मण " के  रूप में व्यक्तिवाचक के रूप में बदल दिया गया। पाली में "अरहत" का मतलब है जिसने सत्य को जान लिया और सत्य पर चलकर निर्वाण अवस्था को प्राप्त कर लिया है। शब्द "अर्र" का मतलब मनुष्य के विकार द्वेष, ईर्ष्या, लोभ,आदि से है तथा शब्द "  hut " का मतलब है मारना याने विकारों को मार कर सत्य को जानना। शब्द " बोधिसत्व " का मतलब है जिसने सत्य को सिर्फ जाना ही नही,बल्कि उस सत्य ज्ञान को दूसरो की तरफ बढ़ाया भी। बोधिसत्व स्वयं भी निर्वाण को सत्य ज्ञान से प्राप्त होतेहै और दुसरो को भी उस मार्ग में ले जाने का प्रयास करते है। गौतम बुद्ध अरहएत को प्राप्त करके बुद्ध बनके बोधिसत्व कहलाए।गौतम बुद्ध से पहले भी बुद्ध रहे लेकिन तथागत गौतम बुद्ध ने चले आ रहे धम्म ज्ञान को और आगे बढ़ाया तथा मनुष्य समाज के लिए चार आर्यसत्य(दुख,दुख का कारण,उसके उपाय और निवारण) बताया। वे इसी प्रमुख तथ्य की वास्तविक खोज में लगे रहे की मनुष्य (हर वर्ग, पुरुष,महिला,युवा) दुखी, परेशान,विचलित क्यों रहता है जबकी उसके पास अनुकूल साधन या सुविधाए है। 
गौतम बुद्ध किसी बुडापे के होने, बीमार होने, मृत्यु हो जाने के तथ्य की खोज में घर बार त्याग कर नही गए बल्कि मनुष्य के लिए वास्तविक सत्य क्या है इसकी खोज में गए। ( डॉ.बी आर.आंबेडकर जी के पुस्तक " बुद्ध और उनका धम्म " में बताया गया है)। तथागत बुद्ध ने प्रदीप्त समुत्पाद कार्य कारण का बात बताया,उन्होंने माध्यम मार्ग बताया, दुखो के निवारण के संबंध में अष्टांगिक मार्ग बताया जिसको अपनाकर मनुष्य सुख को प्राप्त करने की स्थिति में आ सकता है। उन्होंने मनुष्य के लिए दस पारिमितये (अच्छे कार्य करना,अकुशल कार्य नही करना),शिलो का पालन हेतु " पंचशील "(चोरी,व्यभिचार, झूठ,व्यसन,हिंसा नही करना)  बताया। मानुष में समानता, प्रज्ञा, करुणा, मैत्री की परिस्थिति का निर्माण किया जाना बताया।  इस तरह तथागत गौतम बुद्ध अपने धम्म, उपदेशों ,देशनाओं से अन्य की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय और प्रसिद्धि हुए इसलिए उनका महत्व अन्य दूसरे पूर्व के बुद्ध की तुलना में ज्यादा लोकप्रिय हुआ।  सम्राट अशोक ने बुद्ध धम्म को देश, विदेश में प्रचार प्रसार करके फैलाया। बाद में कनिष्क,हर्ष वर्धन,पाल वंश, गुप्ता वंश शासकों ने भी बुद्ध धम्म को फैलाया उनके स्तूप, चैत्य, विहार आदि को देशभर में निर्माण करके बनाया। तथागत गौतम बुद्ध को ही विश्व में प्रथम बार " भगवान " शब्द से संबोधित किया गया है और किसी धार्मिक आराध्य को वह संबोधन नही दिया गया था। भगवान या गॉड शब्द तो बहुत बाद में अलग अलग धार्मिकता वालों ने व्यक्ति को संबोधित करके किया। जबकि शब्द "भगवान" एक गुनवाचक शब्द है जो पाली में " भगवा" शब्द में कहा गया है जिसमे न या एन शब्द साइलेंट रहता है। पाली में भग्ग का अर्थ है नष्ट करने वाला और वा का अर्थ है तृष्णा,राग द्वेष,मोह, याने मनुष्य में निहित तृष्णा,विकार, मार आदि को नष्ट करने वाला अरहएत  गुण रखने वाला भगवान कहलाता है। ऐसे में भगवान का संबोधन गुणवाचक व्यक्ति के लिए है किसी " जगतकर्ता,सृष्टि कर्ता " के लिए नही है। इसलिए तथागत गौतम बुद्ध मनुष्य को सही पर सत्य का मार्ग दिखाने वाला " मार्गदाता "  है। बुद्ध धम्म को उसके उपदेशों को संरक्षित रखने तथागत बुद्ध के महापरि निर्वाण के बाद तुरंत ही बुद्ध संगति की गई।
 जिसमे बुद्ध के मौखिक उपदेशों, देशणाओ,धम्म को संकलित करने का प्रयास हुआ,उसके बाद 03 और बुद्ध धम्म संगतिया की गई जिसमे एक संगति सम्राट अशोक के समय में भी हुई।  श्रीलंका उस समय के सिलोन में वत्तगामी के शासन में सिंहली भाषा में त्रि पितक संकलित किए गए बाद में बुधघोष द्वारा पाली में त्रि पीटक, अट्ठा कथा को संकलित किया गया। 
किसी अन्य धार्मिकता में इस तरह का संगति करके उपदेशों को संकलित किया जाने का उदाहरण नही दिखता।
               बुद्ध धम्म
हीनयान(थेरवाद),महायान और वज्रयान में समय समय पर विभक्त हुआ लेकिन तथागत बुद्ध के मूल सिद्धांत बने रहे। तथागत बुद्ध के काल समय में सम्राट अशोक के काल समय में मूर्तिकला नही के बराबर थी। ग्रीक और रोम के इतिहास में मानव,देव आदि के मूर्तिकला का विकास मिलता है । अफगानिस्तान के गांधार क्षेत्र में ग्रीक/रोमन का भी प्रभाव रहा है। तब कनिष्क काल में ग्रीक/ रोमन शैली में तथागत बुद्ध की मूर्तिया बनाई गई जिसे "गांधार मूर्ति कला" शैली कहा जाता है। बुद्ध की मूर्ति की बनावट रोमन शैली की थी लेकिन मूर्ति के हावभाव,भंगिमाएं बुद्ध के उपदेश,देशणाओं के अनुरूप थी। उस काल समय में भारतीय भू भाग के किसी भी अन्य धार्मिकता के अराध्य की मूर्ति नही बनाई गई। बाद में मथुरा कला में मूर्तिया बनाई जाने लगी जो पूरी तरह से भारतीय शैली में थी। इसके बाद दक्षिण भारत में एक अन्य मूर्ति कला विकसित हुई। जिसमे मुख्य मूर्ति के अगल बगल अन्य लोग या देव,देवियों किमूर्ति भीं बनाई जाने लगी।अजंता,एलोरा,कोन्हेरी,कारले आदि गुफाओं में बुद्ध और धम्म संबंधी मूर्ति तथा चित्रकारी मिली है। सांची स्तूप,भरहुत,बिहार, नालंदा,तक्चशीला, विक्रमशिला में बुद्ध कालीन प्रमाण तथा अवशेष प्राप्त हुए है। दिल्ली, मथुरा,कोलकाता,तकचशिला, ब्रिटेन आदि संग्रहलैयो म्यूजियम में भी बुद्ध के प्रमाण तथा अवशेष मौजूद है। वास्तव में बुद्ध धम्म ही यहां भारतीय भू भाग का मूल धम्म या धार्मिकता रही है। चूंकि बुद्ध धम्म को राजा,शासक,सामंत,जमींदार और आम जनता सभी को समान रूप से अपना करके उसके उपदेशों को पालन करना होता था,किसी को हिंसा, बलि का,शोषण का अधिकार नहीं था इसलिए बड़े लोग पुरोहित,कुछ शासक को उक्त व्यवस्था पसंद नहीं आई। इसलिए पुरोहित और शासकों ने मिलकर बुद्ध धम्म को कमजोर करने लगे और उसके स्थान पर एक अलग धार्मिकता को समाज में थोपने का काम किए। 07 वी, 08 वी शताब्दी में तथा कथित शंकराचार्य, रामानुजाचार्य आदि ने उस समय के शासकों से मिलकर शैववाद, वैश्णववाद की धार्मिकता को स्थापित करने लगे। 
बुद्ध,जैन धार्मिकता के शमन / श्रमण सभ्यता को प्रभावहीन किया जाने लगा। फिर विदेशी आक्रमण भारतीय भू - भाग पर हुए,उनका विरोध पुरोहित और उनके समर्थित शासकों ने नही किया। विदेशियों ने बुद्ध कालीन धरोहरों को छती पहुचाई तो सवर्ण शासकों ने बचाने विरोध नही किया। मुगल और ब्रिटिश के इस देश में शासन के दौरान पुरोहित वर्ग और शासक उनके ही अधीन रहकर उन विदेशियों की चाटुकारी करते रहे। 
इस तरह बुद्ध धम्म को इस देश से प्रभावहीन किया जाना प्रगट होता है। बाद में श्रीलंका के अनारिग धम्मपाल ने गया के महाबोधी महाविहार के लिए संघर्ष किया,बुद्ध के अस्तित्व को पुनः स्थापित का प्रयास हुआ। 1956 में बाबा साहब डॉ.भीम राव अंबेडकर जी ने बुद्ध धम्म अपना लिया और भारत में बुद्ध धम्म को स्थापित करने में अपना योगदान दिया। बुद्ध धाम में उसका विशाल साहित्य भी है। जिसमे विनय पिटक,सुत्त पिटाक,अभिधम्म पिटक है जिन्हे त्रि पीटक कहा जाता है। उनमें प्रत्यक में पांच पांच और अलग अलग साहित्य है। तथागत बुद्ध आम जनता को अपने उपदेशों को समझाने के लिए कथाएं उदाहरण के रूप में बताया और सुनाया करते थे जिससे लोग सरलता से बताए ज्ञान को समझ जाते थे,उन्हे " जातक कथाएं " कहा जाता है। भारत स्वतंत्र हुआ तो बुद्ध धम्म के साहित्य, ग्रंथ को स्कूल, कालेज के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं किया गया। 
वर्तमान में जो बुद्ध धम्म अनुआइ है वे बुद्ध के सभी साहित्य का अवलोकन करके देश और आम लोगो में उसके प्रचार प्रसार द्वारा उन्हें बुद्ध धम्म के वस्तविकता को जानने, समझाने प्रेरित करे। बुद्ध और उनके धम्म की वास्तविक इतिहास को आम लोगो के सामने लाया जावे। क्योंकि भारतीय भू - भाग का वास्तविक धम्म या धार्मिकता बुद्ध धम्म ही मालूम होता है। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने अपने सम्पूर्ण वांग्मय (चालीस भाग वाले) के वाल्यूम सात में (उसके चेप्टर 07) में उल्लेख किया है कि भारतीय भूभाग का वास्तविक इतिहास और कुछ नही है बल्कि " बुद्ध धम्म और ब्राह्मणवाद के बीच महत्ता को लेकर संघर्ष रहा है।" 
 बुद्ध जयंती की शुभकामनाएं, सबका मंगल हो।

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