कार्यस्थल और रिश्तों के दोहरे मापदंडों पर प्रहार करती 'इंजी. रमाकांत' की नई नज्म।


प्रमोद कुमार बंजारे संभाग ब्यूरो चीफ

कोरबा ( सुघर गांव )। साहित्य और लेखनी के क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान रखने वाले कोरबा के इंजीनियर रमाकांत श्रीवास ने अपनी ताज़ा नज्म के जरिए समाज और कार्यस्थलों पर मौजूद "दोहरे व्यवहार" वाले व्यक्तित्वों पर तीखा कटाक्ष किया है।

नज्म का सार

रचनाकार ने उन लोगों की मानसिकता को उजागर किया है जो खुद की खामियों को नजरअंदाज कर दूसरों की छोटी सी भूल का बड़ा हिसाब रखते हैं। कविता की पंक्तियां—"खुद की फाइलें महीनों से पड़ी हैं धूल तले, मगर मेरी एक भूल पे किताब रखता है"—प्रशासनिक और कॉर्पोरेट जगत में व्याप्त लेग-पुलिंग (टांग खिंचाई) की संस्कृति को बखूबी बयां करती हैं।

मुख्य बिंदु

नकारात्मकता पर प्रहार: दूसरों की तरक्की से जलने वाले और मीठी बातों के पीछे 'तेजाब' जैसा जहर रखने वालों का पर्दाफाश।

सहयोग की अपील

रचनाकार संदेश देते हैं कि यदि ऐसे लोग साथ दें तो सफर आसान हो सकता है, लेकिन वे अक्सर बाधा बनने का काम करते हैं।


वो और उसकी शिकायत।

कोरबा के प्रसिद्ध रचनाकार इंजी. रमाकांत श्रीवास जी की एक मर्मस्पर्शी रचना, जो आज के दौर के कड़वे सच को आईना दिखा रही है। लफ़्ज़ मीठे हैं मगर दिल में तेज़ाब रखता है। यह नज्म उन लोगों के लिए है जो औरों में सिर्फ कमियाँ ढूंढते हैं, जबकि खुद के गिरेबान में झांकना भूल जाते हैं। समाज के इस "नकाबपोश" चेहरे को शब्दों में पिरोने के लिए कवि की कल्पना सराहनीय है।

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