हरदीबाजार में शुरू हो रहा 03 दिवसीय भव्य मड़ाई मेला ,लोक संस्कृति,पारंपरिक खेल और स्वादिष्ट व्यंजनों का रंगीन संगम
विष्णु कुमार यादव जिला ब्यूरो
कोरबा (सुघर गांव)। 04 दिसंबर 2025,
जिले के पाली ब्लॉक के ग्राम पंचायत हरदीबाजार में सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक 03 दिवसीय मड़ाई मेला, इस वर्ष 19 दिसंबर से 22 दिसंबर तक भाटापारा में आयोजित किया जाएगा। यह मेला न केवल छत्तीसगढ़ की जीवंत सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाता है,बल्कि स्थानीय समुदाय के उत्साह और आनंद का भी केंद्र बनता है।
मड़ाई मेला परंपरा और महत्व
हरदीबाजार का मड़ाई मेला वर्षों से स्थानीय संस्कृति की रीढ़ के रूप में जाना जाता है। यह मेला ग्रामीण जीवन, परंपराओं और लोककलाओं का सजीव मंच है। लोक संगीत और नृत्य पारंपरिक गीत और नृत्य से हर उम्र के लोग मंत्रमुग्ध होंगे। स्थाननीय व्यंजन स्वादिष्ट छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का आनंद लिया जा सकेगा। पारंपरिक खेल मनोरंजन और प्रतिस्पर्धा का अवसर। आर्थिक अवसर स्थानीय कारीगर और व्यापारी अपने उत्पादों को प्रदर्शित कर आर्थिक लाभ उठा सकते हैं।
ग्राम पंचायत की बैठक और मेला आयोजन
मेला आयोजन को लेकर ग्राम पंचायत की बैठक में शामिल थे सरपंच लोकेश्वर कंवर,गौंटिया मदनमोहन कंवर,उपसरपंच रेखा जायसवाल,सदस्य प्रदीप राठौर,उमेश राठौर,बाबी राठौर, राजेन्द्र जगत,मेकमिलन राज,राकेश ओग्रे,नयन कुंवर ओड़, श्यामबाई सवित्री कंवर,नंदनी राठौर,इंद्रा बाई मरावी,नेहा सतनामी, ममता ओग्रे, लाला राठौर सभी पंच प्रतिनिधि और ग्रामवासी बैठक में शामिल होकर सर्वसम्मति से मेला आयोजित करने का प्रस्ताव पारित किया।
मेला में आकर्षण
हरदीबाजार मड़ाई मेला इस बार और भी रंगीन और आकर्षक होगा - सांस्कृतिक कार्यक्रम रंग-बिरंगे नृत्य, संगीत और नाटक। हस्तशिल्प और लोककला प्रदर्शन स्थानीय कारीगरों के उत्कृष्ट काम का मंच। स्थानीय व्यंजन स्वादिष्ट पारंपरिक खानपान का अनुभव। मनोरंजन और खेलकूद बच्चों और युवाओं के लिए विशेष गतिविधियाँ। सामाजिक और आर्थिक उत्साह मेला क्षेत्र में सामाजिक मेलजोल और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देगा।
उत्सव का संदेश
हरदीबाजार का मड़ाई मेला सिर्फ एक उत्सव नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपरा का जीवंत उत्सव है। यह मेला स्थानीय लोककलाओं को नई ऊर्जा, समुदाय को उत्साह और क्षेत्र में सामाजिक एवं आर्थिक समृद्धि का संदेश देता है। हरदीबाजार मड़ाई मेला यह साबित करता है कि परंपरा और आधुनिकता का संगम, आनंद और सांस्कृतिक गर्व का उत्सव कैसे बन सकता है।
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