एक पेड़ मां के नाम.. तो फिर हसदेव परसाकोल के घने जंगलों की अंधाधुंध अवैध पेड़ों की कटाई आखिर किसके नाम..?

एक पेड़ मां के नाम.. तो फिर हसदेव परसाकोल के घने जंगलों की अंधाधुंध अवैध पेड़ों की कटाई आखिर किसके नाम..?


छत्तीसगढ़ के फेफड़ा स्थल कहे जाने वाले हसदेव जंगल के पेड़ों की हो रही अंधाधुंध कटाई.. आखिर कौन जिम्मेदार..?


छत्तीसगढ़ ब्यूरो चीफ/ जावेद अली आज़ाद 


हसदेव(सुघर गांव)। दरअसल हसदेव अरण्य क्षेत्र के जमीन के नीचे अचल कोयले का भंडार पाया गया है। जिसके चलते यहां परसा ईस्ट केते बासेन खदान बनाए जाने का निर्णय लिया गया है। लगभग 1 लाख 70 हजार हेक्टेयर में से 137 एकड़ जंगल के क्षेत्र के पेड़ों की कटाई हो चुकी है। ऐसे में स्थाई ग्रामीण इस जंगल को काटे जाने का लगातार विरोध कर रहे हैं। ग्रामीणों के निवास स्थलों को अस्त व्यस्त करते हुए प्रशासन की सहयोग से कोयला खदान खुलने और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई को लेकर अग्रेषित है, वही छत्तीसगढ़ सरकार इस मामले को गंभीरता से नहीं लेते हुए ग्रामीणों की एक भी बात नहीं सुनी जा रही।




घने जंगल में दिव्य आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां और वनस्पति मौजूद –


वनों की अंधाधुंध कटाई होने से पर्यावरण प्रभावित हो रहा है साथ ही विशाल प्रदूषण भी हो रहा है। जिसका सीधा असर पर्यावरण पर देखने को मिल रहा है। मौसम मौसम का रुख और वर्षा पर भी प्रभाव पड़ रहा है। वृक्षों और अन्य वनस्पतियों के नष्ट होने से जलवायु परिवर्तन, मरुस्थलीकरण, मृदा अपरदन, कम फसलें, बाढ़, वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि तथा मूल निवासियों के लिए अनेक समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।हसदेव अरण्य, जो छत्तीसगढ़ राज्य में स्थित है, एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण जंगल है। यह 170,000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है और यहाँ विविध पारिस्थितिकी और आदिवासी समुदाय रहते हैं। इसे "मध्य भारत का फेफड़ा" भी कहा जाता है। 


हसदेव अरण्य का इतिहास–


हसदेव अरण्य प्राचीन समय से आदिवासी समुदायों, जैसे गोंड, उरांव और पहाड़ी कोरवा, का घर रहा है। यह जंगल अपनी जैव विविधता के लिए जाना जाता है, जिसमें साल और महुआ जैसे आर्थिक और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण पेड़ शामिल हैं। 

1996 में, इस क्षेत्र को "नो-गो ज़ोन" घोषित किया गया था, लेकिन बाद में कोयला खनन के लिए अनुमति दी गई। 2010 से, इस क्षेत्र में कोयला खनन के लिए पेड़ों की कटाई शुरू हुई, जिससे स्थानीय लोगों में विरोध शुरू हो गया। 2022 में, भी छत्तीसगढ़ सरकार ने इस क्षेत्र में कोयला खनन के लिए मंजूरी दी, जिससे हसदेव अरण्य आंदोलन और मजबूत हो गया। 


हरदेव अरण्य के महत्व–


हसदेव अरण्य "मध्य भारत का फेफड़ा" है और इसे छत्तीसगढ़ के जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। यह जंगल स्थानीय समुदायों की आजीविका के लिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे वन आधारित संसाधनों पर निर्भर हैं। 

यह जंगल हाथियों और बाघों के लिए भी एक निवास स्थान और गलियारा है। हसदेव नदी के जल ग्रहण क्षेत्र के रूप में, यह राज्य की मुख्य फसल धान की सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है। 







वर्तमान में हसदेव का हाल–

इस क्षेत्र में कोयला खनन के लिए पेड़ों की कटाई जारी है, जिससे स्थानीय लोगों और पर्यावरणविदों में चिंता बढ़ रही है। हसदेव अरण्य आंदोलन इस क्षेत्र में कोयला खनन के खिलाफ चल रहा है और स्थानीय लोग अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इस आंदोलन को कई राजनीतिक और गैर राजनीतिक दलों और संगठनों का समर्थन प्राप्त है। सत्ता की कुर्सी पर बैठे बयानबाजी करने वाले नेताओं ने पर्यावरण दिवस पर बहुत आसान तरीके से जनता को कह दिया कि "एक पेड़ मां के नाम" तो छत्तीसगढ़ की जनता सरकार से पूछती है हसदेव अरण्य के अवैध पेड़ों की अंधाधुंध कटाई आखिर किसके नाम..??





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