प्रमोद कुमार बंजारे संभाग ब्यूरो चीफ
कोरबा ( सुघर गांव न्यूज ) छत्तीसगढ़ के हिन्दू इतिहास और संस्कृति का गहराई से अध्ययन करने पर यह बात स्पष्ट होती है, कि समय-समय पर विभिन्न देवी-देवताओं की उपासना का प्रभाव समाज पर रहा है। कभी महादेव शंकर जी का प्रभाव अधिक था, तो कभी श्रीहरि विष्णु का; कभी ब्रह्मा जी की पूजा प्रमुख रही, तो कभी देवियों की शक्ति का व्यापक सम्मान हुआ। हर युग में इन देवी-देवताओं को मानने वाले अपने-अपने तरीके से उनकी आराधना करते रहे हैं।
कभी समाज ने समभाव अपनाया – “मेरा भगवान मेरे लिए महान, और आपका भगवान आपके लिए।” यह भाव सहयोग, सम्मान और एकता को जन्म देता रहा। लेकिन जब किसी एक मत को श्रेष्ठ और दूसरों को तुच्छ बताने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया, वहीं से कलह, संघर्ष और वैमनस्यता की शुरुआत हुई।
इतिहास साक्षी है – न तो कोई एक परंपरा या विचारधारा पूर्णतः हावी हो पाई, और न ही कोई विचारधारा या देवता-भक्ति पूर्णतः समाप्त हुई। सबका अस्तित्व बना रहा – किसी का प्रभाव अधिक, किसी का थोड़ा कम।
आज का समाज भी कुछ ऐसा ही है। कोई किसी फिरका को मानता है, कोई किसी पार को; कोई सर्व समाज समभाव में विश्वास रखता है। यह विविधता हमारी शक्ति है, कमजोरी नहीं। समाज रूपी बरगद की जड़ें तभी मजबूत होंगी जब हम सब एक-दूसरे का सम्मान करें, सहिष्णुता और सहयोग की भावना रखें।
हमें ऐसा सर्व समाज बनाना है जिसकी छाँव में हर व्यक्ति, हर विचार, हर फिरका अपने अस्तित्व के साथ सुरक्षित और सम्मानित महसूस करे। यही सच्चा समाजिकता है, यही सच्चा समाज धर्म है।
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