प्रमोद कुमार बंजारे संभाग ब्यूरो चीफ 

कोरबा/दीपका ( सुघर गांव )। देश को अपनी ऊर्जा से रोशन करने वाले कोरबा के कोयलांचल क्षेत्र में इन दिनों अंधेरा छाया हुआ है, लेकिन यह अंधेरा बिजली का नहीं बल्कि रसोई के चूल्हों का है। गेवरा-दीपका क्षेत्र में रसोई गैस (LPG) की भारी किल्लत ने आम जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। 'भारत गैस गेवरा प्रोजेक्ट कंज्यूमर्स को-आपरेटिव स्टोर्स लिमिटेड' के चक्कर काटते-काटते उपभोक्ताओं के जूते घिस गए हैं, लेकिन उन्हें खाली हाथ ही लौटना पड़ रहा है।

अव्यवस्था और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

पीड़ित उपभोक्ताओं का आरोप है कि गैस वितरण प्रणाली पूरी तरह चरमरा गई है। सप्ताह में बमुश्किल एक या दो बार गैस की गाड़ी आती है, लेकिन उसमें भी रसूखदारों और बिचौलियों की साठगांठ से सिलेंडरों की बंदरबांट कर दी जाती है। महीनों से बुकिंग कराकर कतार में खड़े आम आदमी को केवल आश्वासन मिलता है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह महज कुप्रबंधन है या पर्दे के पीछे कालाबाजारी का खेल चल रहा है?
घर-घर में बढ़ा तनाव, 'गृह-लक्ष्मी' की नाराजगी

गैस न मिलने का सीधा असर अब घरों की शांति पर पड़ रहा है। समय पर खाना न बनने के कारण स्कूली बच्चों और कामकाजी कर्मचारियों को भूखे पेट या देरी से घर से निकलना पड़ रहा है। आक्रोशित उपभोक्ताओं ने व्यंग्य करते हुए कहा कि गैस की किल्लत के कारण उन्हें घर में अपनी 'गृह-लक्ष्मी' की खरी-खोटी सुननी पड़ रही है, जिससे पारिवारिक कलह की स्थिति निर्मित हो रही है।

सरकारी दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर

एक तरफ केंद्र सरकार देश में गैस की पर्याप्त उपलब्धता के दावे करती है, वहीं दूसरी ओर कोयलांचल की जनता महीनों से एक सिलेंडर के लिए तरस रही है। स्थानीय लोगों का पूछना है कि यदि गैस की कमी नहीं है, तो फिर यह वितरण तंत्र इतना विफल क्यों है? क्या स्थानीय प्रशासन और एजेंसी की मिलीभगत से जनता को जानबूझकर परेशान किया जा रहा है?
आंदोलन की चेतावनी

एक सप्ताह में सुधार वरना होगा चक्काजाम क्षेत्र की जनता और कर्मचारी संगठनों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। उन्होंने स्थानीय प्रशासन और गैस एजेंसी को चेतावनी दी है कि यदि एक सप्ताह के भीतर वितरण व्यवस्था दुरुस्त नहीं हुई और कालाबाजारी पर लगाम नहीं कसी गई, तो उग्र जन-आंदोलन, घेराव और धरना प्रदर्शन किया जाएगा। इसकी पूरी जिम्मेदारी संबंधित विभाग और प्रशासन की होगी।